Bahujan Sahitya ki Prastavna; Edited by Pramod Ranjan and Ivan Kostka

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दलित, पिछड़े, आदिवासी, आदिम जनजातियां आदि जिन जाति-समूहों को केंद्र में रखकर बहुजन साहित्य की अभिकल्पना की गई है, वे सभी किसी न किसी श्रम-प्रधान जीविका से जुड़े हैं। उनकी पहचान उनके श्रम-कौशल से होती आई है। मगर जाति-वर्ण संबंधी असमानता और संसाधनों के अभाव में उन्हें उत्पीड़न एवं अनेकानेक वंचनाओं के शिकार होना पड़ा है। बहुजन साहित्य यदि जातियों की सीमा में खुद को कैद रखता है तो उसके स्वयं भी छोटे-छोटे गुटों में बंट जाने की संभावना निरंतर बनी रहेगी। इसलिए वह स्वाभाविक रूप से श्रम-संस्कृति का सम्मान करेगा। फलस्वरूप विभिन्न जातियों के बीच स्तरीकरण में कमी आएगी। उसकी यात्रा सर्वजनोन्मुखी साहित्य में ढलने की होगी। कुल मिलाकर बहुजन साहित्य का वास्तविक ध्येय जाति उच्छेद ही होगा – ओम प्रकाश कश्यप, लेखक

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