तथ्य-आधारित पुस्तक

पुस्तक की भाषा सरल, स्पष्ट, भावुक और आंदोलनकारी है। इस कारण यह बहुजन पाठकों तक आसानी से समझ में आने वाली है। ... उद्धरणों की भरमार (गोलवलकर, भागवत, राकेश सिन्हा आदि से) इसे तथ्य-आधारित बनाती है। वर्तमान चिंतन में यह अत्यंत प्रासंगिक है। - तारा राम, सामाजिक कार्यकर्ता व बहुजन विचारक, राजस्थान

‘वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक सैद्धांतिकी गढ़ती किताब’

कुल ग्यारह अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक ‘हिंदुत्व में शूद्र’, ‘ईश्वर की शूद्र, ब्राह्मणवादी और यहूदी अवधारणा’, ‘शूद्र कृषिवाद व भारतीय सभ्यता’, व ’हिंदू राष्ट्र में शूद्रों के लिए खतरे’ सरीखे विषयों को प्रमुखत: संबोधित है। विगत वर्षों में हिदुत्ववादी राजनीति के उभार और धर्मनिरपेक्षता के नेहरूवादी ढांचे के प्रश्नांकन के साथ विकल्प की राजनीति के लिए जिस सामाजिक-राजनीतिक सैद्धांतिकी की जरूरत महसूस की जा रही है, यह पुस्तक उसकी एक ठोस वैचारिकी निर्मित करती है। – वीरेंद्र यादव, समालोचक