Chintan ke Jansarokar; By Premkumar Mani

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दलित-बहुजन मुक्त अर्थव्यवस्था का न ज्यादा अभिनंदन कर रहे हैं और न ही उससे ज्यादा भयभीत हैं। ग्लोबल अर्थव्यवस्था ने देशी बनिया-ब्राह्मणवादी अर्थव्यवस्था को चुनौती दी है और उम्मीद की जाती है कि अंतत:, वह उसे ध्वस्त कर देगी। इसे बहुजन नजरिया सकारात्मक मानता है। लेकिन आखिर क्या है कि मुक्त अर्थव्यवस्था और नेहरु युग की समाजवादी अर्थनीति दोनों से बहुजन व्यामोह पालते हैं? यह व्यामोह इसलिए है कि दोनों ने ब्राह्मण सामंतवादी अर्थनीति पर चोट नहीं की। नेहरु युग में हुए आर्थिक विकास को सामाजिक विाकास से पूरी तरह नहीं जोड़ा जा सका। इसलिए इसका अपेक्षित फायदा दलित-पिछड़े नहीं उठा सके। इसके मुकाबले, उच्च जातियों के लोगों ने इसका भरपूर फायदा उठाया और पब्लिक सेक्टर पर पूरी तरह काबिज हो गए। (इसी पुस्तक से) 

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